मधुशाला by Harivansh Rai Bachchan
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यह १३५ बेशकीमती रुबाइयाँ मात्र किसी मधुशाला के लिए एक क़सीदा नहीं है अपितु गाती हुई रूपक है ज़िन्दगी की , वह ज़िन्दगी जो उजाले और अंधेरे से, न्यायनीति और भेदभाव से ,आलिंगन और अभाव से परिपूर्ण है |

अपनी कलम को नीली स्याही में डुबाये, हमारा दीवाना सा वर्णनकर्ता लिखता चला जाता है; लिखता है गुनगुनाते हुए जीवन की नीरसता की गाथा, जिसमे उसके विचारों की टोकरी को मात्र एक हाला का प्याला, किसी मधुशाला का निवाला, संभाले हुए हैं | एक छेड़ती हुई प्रेमिका की तरह मधुशाला शानदार अमृत-पान के वादे के साथ आकर्षित करती है लेकिन उन मदिराओं को ज़रा दूर सिरका देती है; शायद मिलन से पूर्व उस दीवाने के पैरों की स्थिरता की अपेक्षा में | लेकिन जीवन की शासकों के नीति के विपरीत, यहां लोगों के अपने सपनों के पीछे भागने पर कोई पाबंदी नहीं है | जाति, संस्कृति, धर्म और स्थिति भुला कर , मधुशाला सभी को समा लेती है और इसी अदा से उसका आकर्षण बहुत गुना बढ़ जाता है | हमारा वर्णनकर्ता यह मानता हैं की हवा में उड़ी कोई स्वाश भी उन्मादता से अनछुई नहीं है ; अरे वह शहीद भी तो आज़ादी के नशे में जिया करता है ! हर प्याले के संग प्यास जैसे मिट सी जाती है किन्तु थोड़ी तलब फिर भी बाकी रह जाती है | नहीं होती अगर अपूर्ण तृप्ति , तो आँखों के किस समंदर में सूरज की नवीन किरणों उतरती? नहीं होती अगर थोड़ी ऊंस घाव में बाकी, तो कौन राह देखता शीतल, सुहाती चन्द्रमा का?

लेकिन आखिर कब तक एक मधुशाला, अपनी दीवारों को कुरेदती दुनिया से सुरक्षित रखती ? एक दिन, वह ढह गयी | बड़ी बड़ी बातों का पिटारा, अंततः छोटी खुशियों को निगल गया और मधुशाला, बेचारी इस बह्मांड के विशाल काया में लुप्त हो गयी | और उसी के संग, हमारा वर्णनकर्ता भी क्षिण हो गया | पर राख बनने से पूर्व, उसकी एक ही विनती थी – मुझे न दफन करना, न मुझे जलाना, न की अमृत से मेरे होंठ गीले करना, न मेरा कहीं नाम लिखना और न मेरे सम्बन्धियों को सूचित करना | करना तो बस यही की मेरे शव को उस स्थल पर रखना जहां कभी कोई मधुशाला हुआ करती थी, जहां उपलब्धियां और कमियों के बारे में न कोई प्रश्न पूछता था और जहां समाने का एकमात्र योग्यता एक शुद्ध इरादा एवं निष्कपटी भावना होती थी |


This splendorous string of 135 quatrains is not just an ode to the tavern; it is a metaphoric meditation on life that is fraught with light and darkness, equity and discrimination, embrace and absence.

Dipping his pen into the inky blue of his heart, our vagabond scribbles; scribbles away the humdrum with a humming cornucopia of thoughts that demands nothing but a mere glass of wine in his favourite tavern, to bloom. Like a teasing lover, the tavern attracts with the promise of magnificent elixirs but removes them from an arm’s length, perhaps fortifying the vagabond’s feet to assume stability before the union. Oh but unlike the perceptions of life’s police, there is no bar on the type of people who can reach for their dream catch and thus, merging caste, culture, religion and status, the tavern romps up its allure in no time. Our narrator insists there is no breath scurrying in the air without the hint of intoxication in it, why, for even the martyrs in the war are inebriated by the promise of freedom! And with every glass, and one more, the thirst gets full and yet remains a bit hungry. If not for incomplete satiation, who would present the pool of eyes over which the new sun may dawn upon? If not for that tinge of unhealed wound, who would await the tender medication of the pale, nursing moon?

But how long can a tavern, after all, uphold its walls from the blotched world? One day, it cows down. The infallible grasp of enormous things, eventually, usurps small happinesses, dispatching the mere tavern into the might belly of the constantly fire-bellowing universe. And along with it, perishes our narrator. But before he becomes ash, he has one request; to not bury him or set his corpse on fire, to not wet his lips with nectar of any kind, to not register his name anywhere, to not inform his links to the material world. He simply wants to be laid down on a ground where there was once a tavern, where no questions are asked of accomplishments and misses and only qualification to be accepted is a pure intent to be one’s self, without the rhetoric of duplicity.

 

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[Image courtesy goodreads.com, 4to40.com]

 

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